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शिव तांडव स्तोत्रम् भगवान शिव की स्तुति में रचा गया संस्कृत स्तोत्र है। इसका नाम दो शब्दों से मिलकर बना है—शिव और तांडव। तांडव भगवान शिव से संबद्ध दिव्य नृत्य का नाम है, जबकि स्तोत्र का अर्थ किसी देवता की स्तुति या प्रशंसा में रचित काव्यात्मक प्रार्थना है।
स्तोत्र में शिव के तांडव की गतिशीलता के साथ-साथ उनके स्वरूप की अनेक विशेषताओं का वर्णन किया गया है—जैसे जटाओं में बहती गंगा, मस्तक पर अर्धचंद्र, ललाट की अग्नि, गले में सर्प, हाथ में डमरू और उनका त्रिनेत्र।
साहित्यिक दृष्टि से भी यह स्तोत्र विशेष महत्व रखता है। इसके अधिकांश श्लोकों में अत्यंत सघन संस्कृत शब्द-संयोजन और लय दिखाई देती है। उपलब्ध पाठ परंपरा में इसे पञ्चचामर छंद से संबद्ध बताया गया है, जबकि अंतिम श्लोक के लिए वसंततिलका छंद का उल्लेख मिलता है।
शिव तांडव स्तोत्र किसने लिखा ?
परंपरा के अनुसार शिव तांडव स्तोत्र के रचयिता रावण माने जाते हैं। संस्कृत ग्रंथ-संग्रहों में भी इसे “रावणरचितम्” तथा “रावणकृत शिवताण्डवस्तोत्रम्” के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
रावण को रामायण परंपरा में लंका का राजा, महान विद्वान और भगवान शिव का भक्त बताया गया है। शिव तांडव स्तोत्र इसी शिव-भक्ति की परंपरा से जुड़ा हुआ माना जाता है।
लेकिन आज जिस 17-श्लोकी “शिव तांडव स्तोत्र” का पाठ लोकप्रिय है, उसे सीधे वाल्मीकि रामायण का श्लोक-संग्रह बताना उचित नहीं है। इसके पाठ की अलग-अलग परंपराएँ मिलती हैं और कुछ संस्करणों में श्लोकों की संख्या तथा शब्दों में अंतर भी पाया जाता है।
रावण ने शिव तांडव स्तोत्र क्यों लिखा?
पारंपरिक कथा के अनुसार रावण भगवान शिव का महान भक्त था। कैलाश से संबंधित घटना के बाद उसने भगवान शिव की स्तुति की। शिव तांडव स्तोत्र में उसकी भक्ति के साथ-साथ शिव के विराट, रौद्र, सौंदर्यमय और कल्याणकारी स्वरूप का वर्णन दिखाई देता है।
इसलिए इस स्तोत्र को केवल शिव के तांडव का वर्णन समझना पर्याप्त नहीं है। इसमें भक्त का अपने आराध्य के प्रति आकर्षण, समर्पण, ध्यान और शिव के विभिन्न रूपों के प्रति श्रद्धा भी व्यक्त होती है।
शिव तांडव स्तोत्र का अर्थ और भावार्थ हिंदी में
अब प्रत्येक श्लोक के अर्थ को सरल हिंदी में समझते हैं। संस्कृत के इन श्लोकों में बहुत लंबे समास हैं, इसलिए केवल शब्द-दर-शब्द अनुवाद करने के बजाय उनके समग्र भाव और चित्रात्मक अर्थ को समझना अधिक उपयोगी है। प्रकाशित अर्थ-संस्करण में भी इन श्लोकों का विस्तृत शब्दार्थ और भावार्थ दिया गया है।
जटाटवी गलज्जल प्रवाह पावित स्थले,
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंग तुंग मालिकाम।
डमड्डमड्डमड्डमन् निनाद वड्डमर्वयं,
चकार चंड तांडवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥
Jataatavi galaj-jal pravaah paavit sthale,
Gale'valambya lambitaam bhujang tung maalikam.
Damad-damad-damad-daman ninaad vad-damarvayam,
Chakaara chanda taandavam tanotu nah Shivah Shivam.
अर्थ:
पहले श्लोक में भगवान शिव की जटाओं का अत्यंत सुंदर और शक्तिशाली चित्र प्रस्तुत किया गया है। उनकी घनी जटाओं से गंगा की धारा प्रवाहित हो रही है और उनके गले में विशाल सर्प माला के समान लिपटा हुआ है।
भगवान शिव के हाथ में डमरू है, जिसकी ध्वनि “डमड्-डमड्” के रूप में गूंज रही है। इसी लय के साथ शिव प्रचंड तांडव कर रहे हैं।
अंत में भक्त प्रार्थना करता है कि वह शिव, जो ऐसा दिव्य तांडव कर रहे हैं, हमारे लिए शिव अर्थात कल्याण और मंगल प्रदान करें।
मुख्य भाव: शिव का तांडव केवल उग्रता का प्रतीक नहीं है; उसके भीतर सृजन, परिवर्तन और कल्याण का भाव भी निहित है।
जटाकटाह संभ्रम भ्रमन् निलिम्प निर्झरी,
विलोल वीचि वल्लरी विराजमान मूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वल ललाट पट्ट पावके,
किशोर चंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥
Jataa-kataah sambhram bhraman nilimp nirjhari,
Vilol veechee vallari viraajmaan moordhani.
Dhagad-dhagad-dhagaj-jval lalat patt paavake,
Kishor Chandra-shekhare ratih pratikshanam mama.
अर्थ:
इस श्लोक में शिव की जटाओं में बहती हुई दिव्य गंगा का वर्णन है। गंगा की लहरें शिव की जटाओं के बीच गति कर रही हैं और उनके सिर को अलंकृत कर रही हैं।
उनके ललाट पर अग्नि प्रज्वलित है और मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है।
भक्त कहता है कि ऐसे शिव के प्रति उसका मन हर क्षण आकर्षित रहे।
मुख्य भाव: यहां शिव के भीतर जल और अग्नि, शीतलता और तेज—दोनों का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है।
धराधरेन्द्र नंदिनी विलास बंधु बंधुर,
स्फुरद्दिगंत संतति प्रमोद मान मानस।
कृपा कटाक्ष धोरणी निरुद्ध दुर्धरापदि,
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥
Dharaadharendra Nandini vilaas bandhu-bandhur,
Sphurad-digant santati pramod maan maanas.
Kripaa-kataaksh-dhorani niruddh durdharaapadi,
Kwachid-digambare mano vinodametu vastuni.
अर्थ:
शिव यहां माता पार्वती के साथ जुड़े हुए, करुणामय और सर्वव्यापक स्वरूप में दिखाई देते हैं। पार्वती को पर्वतराज की पुत्री के रूप में संबोधित किया गया है।
शिव की कृपापूर्ण दृष्टि ऐसी है जो कठिन से कठिन संकटों को भी नियंत्रित कर सकती है। उनका मन समस्त दिशाओं और जीवों के कल्याण से जुड़ा हुआ है।
भक्त की इच्छा है कि उसका मन उस शिव में आनंद प्राप्त करे जो संसार की सीमाओं से परे और सर्वव्यापी हैं।
मुख्य भाव: शिव का रौद्र रूप जितना शक्तिशाली है, उनका करुणामय रूप उतना ही महत्वपूर्ण है।
जटा भुजंग पिंगल स्फुरत्फणा मणि प्रभा,
कदंब कुंकुम द्रव प्रलिप्त दिग्वधू मुखे।
मदान्ध सिंधुर स्फुरत् त्वगुत्तरीय मेदुरे,
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥
Jataa-bhujang pingal sphurat-phanaa-mani-prabhaa,
Kadamb kunkum drav pralipt dig-vadhoo-mukhe.
Madaandh sindhur sphurat tvag-uttareey medure,
Mano vinodam-adbhutam bibhartu bhoot-bhartari.
अर्थ:
इस श्लोक में शिव के सर्पाभूषण और उनके अद्भुत स्वरूप का वर्णन है। उनकी जटाओं में स्थित सर्प के फण पर चमकता हुआ मणि प्रकाश उत्पन्न करता है।
शिव का स्वरूप इतना विराट और प्रभावशाली है कि दिशाएं भी मानो उनके आभूषणों से प्रकाशित होती दिखाई देती हैं।
यहां शिव को “भूतभर्ता” अर्थात सभी प्राणियों के आधार और पालनकर्ता के रूप में संबोधित किया गया है।
मुख्य भाव: शिव केवल संहार के देवता के रूप में सीमित नहीं हैं; वे समस्त जीवों के आधार भी हैं।
सहस्र लोचन प्रभृति अशेष लेख शेखर,
प्रसून धूलि धोरणी विधूसरांघ्रि पीठ भूः।
भुजंगराज माला से निबद्ध जाट जूटक,
श्रियै चिराय जायतां चकोर बंधु शेखर॥
Sahasra-lochan prabhriti ashesh-lekh-shekhar,
Prasoon-dhooli-dhorani vidhusar-anghri-peeth-bhooh.
Bhujang-raaj maalayaa nibaddh jata-jootak,
Shriyai chiraay jaayataam chakor-bandhu-shekhar.
अर्थ:
यहां शिव के चरणों का वर्णन किया गया है। अनेक देवताओं द्वारा अर्पित पुष्पों की धूल उनके चरणों तक पहुंचती है।
उनकी जटाएं सर्पराज की माला से बंधी हुई हैं और उनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है।
भक्त प्रार्थना करता है कि ऐसे चंद्रशेखर शिव हमें दीर्घकालीन समृद्धि प्रदान करें।
मुख्य भाव: देवताओं द्वारा भी पूजित शिव की महिमा और सर्वोच्चता को इस श्लोक में व्यक्त किया गया है।
ललाट चत्वर ज्वलत् धनंजय स्फुलिंग भा,
निपीत पंच सायकं नमत् निलिम्प नायकम्।
सुधा मयूख लेखया विराजमान शेखरं,
महाकपालि संपदे शिरो जटालमस्तु नः॥
Lalaat-chatvar jvalad-dhananjay sphuling-bhaa,
Nipeet panch-saayakam namad-nilimp-naayakam.
Sudhaa-mayookh-lekhayaa viraajmaan-shekharam,
Mahaa-kapaali sampade shiro jataalam-astu nah.
अर्थ:
शिव के ललाट की अग्नि से निकलने वाली चिंगारियों ने कामदेव को भस्म कर दिया था। इसलिए शिव को कामांतक से संबंधित रूप में भी समझा जाता है।
इसके साथ ही उनके मस्तक पर शीतल चंद्रमा सुशोभित है।
भक्त शिव की जटाओं और उनके दिव्य स्वरूप से सिद्धि और कल्याण की कामना करता है।
मुख्य भाव: ललाट की अग्नि शिव की शक्ति और वैराग्य का प्रतीक है, जबकि चंद्रमा उनके शीतल और शांत स्वरूप का।
कराल भाल पट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल,
धनंजय आहुती कृत प्रचंड पंच सायके।
धराधरेन्द्र नंदिनी कुचाग्र चित्र पत्रक,
प्रकल्पनैक शिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥
Karaal-bhaal-pattikaa dhagad-dhagad-dhagaj-jval,
Dhananjayaahuti-krit prachand-panch-saayake.
Dharaadharendra-Nandini kuchaagra-chitra-patrak,
Prakalpanaik-shilpini Trilochane ratir-mama.
अर्थ:
इस श्लोक में शिव के तीसरे नेत्र और उनके ललाट की अग्नि का वर्णन और अधिक तीव्र रूप में किया गया है।
कामदेव का उल्लेख यहां फिर आता है। शिव की अग्नि इतनी प्रचंड है कि कामदेव भी उसमें भस्म हो जाते हैं।
श्लोक के अंत में भक्त कहता है कि उसका मन त्रिलोचन शिव में अनुरक्त रहे।
मुख्य भाव: तीसरा नेत्र केवल विनाश का प्रतीक नहीं, बल्कि ज्ञान और विवेक के जागरण का भी प्रतीक माना जाता है।
नवीन मेघ मंडली निरुद्ध दुर्धर स्फुरत्,
कुहू निशीथिनी तमः प्रबंध बद्ध कंधरः।
निलिम्प निर्झरी धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः,
कलानिधान बंधुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ॥
Naveen-megh-mandali niruddh durdhar-sphurat,
Kuh-nee-shithini tamah-prabandh-baddh-kandharah.
Nilimp-nirjhari-dharah stanotu kritti-sindhurah,
Kalaanidhaan-bandhurah shriyam jagad-dhurandharah.
अर्थ:
शिव का कंठ गहरे अंधकार के समान दिखाई देता है, जैसे नवीन मेघों के समूह से घिरा हुआ आकाश।
उनके कंठ और शरीर का यह वर्णन शिव के गंभीर, रहस्यमय और विराट स्वरूप को सामने लाता है।
वे अपनी जटाओं में दिव्य गंगा को धारण करते हैं और जगत के आधार के रूप में वर्णित होते हैं।
मुख्य भाव: शिव का स्वरूप प्रकाश और अंधकार, अग्नि और जल, सौंदर्य और रौद्रता—इन सभी विरोधी प्रतीकों को एक साथ धारण करता है।
प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंच कालिम प्रभा,
अवलंबि कंठ कंदली रुचि प्रबद्ध कंधरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं,
गजच्छिदांधकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥
Praphull-neel-pankaj prapanch-kaalim-prabhaa,
Avalambi-kanth-kandali ruchi-prabaddh-kandharam.
Smarach-chhidam purach-chhidam bhavach-chhidam makhach-chhidam,
Gajach-chhid-andhakach-chhidam tam-antakach-chhidam bhaje.
अर्थ:
इस श्लोक में शिव के अनेक नामों के माध्यम से उनकी शक्तियों का वर्णन किया गया है।
वे स्मरच्छिद् अर्थात कामदेव का अंत करने वाले, पुरच्छिद् अर्थात त्रिपुर का नाश करने वाले, भवच्छिद् अर्थात संसार-बन्धन से मुक्त करने वाले और मखच्छिद् अर्थात यज्ञ के अहंकार का अंत करने वाले रूपों से जुड़े हैं।
वे गजासुर, अंधक और अंतक जैसे दुष्ट या विनाशकारी शक्तियों के संहारक रूप में भी स्मरण किए जाते हैं।
मुख्य भाव: शिव यहां अधर्म, अहंकार, आसक्ति और अज्ञान के विनाशकारी स्वरूप के रूप में प्रकट होते हैं।
अखर्व सर्वमंगला कला कदंब मंजरी,
रस प्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्।
स्मरांतकं पुरांतकं भवांतकं मखांतकं,
गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे॥
Akharv sarva-mangalaa kalaa-kadamb-manjari,
Ras-pravaah-maadhuri vijrimbhanaa madhu-vratam.
Smaraantakam puraantakam bhavaantakam makhaantakam,
Gajaantakaandhakaantakam tam-antakaantakam bhaje.
अर्थ:
यह श्लोक शिव के मंगलमय स्वरूप का वर्णन करता है। उन्हें सभी मंगलकारी शक्तियों के समूह से उत्पन्न मधुर रस के प्रति आकर्षित मधुमक्खी के समान बताया गया है।
इसके बाद शिव के कई संहारक नाम आते हैं—कामदेव, त्रिपुर, संसार, यज्ञ, गजासुर, अंधक और मृत्यु के अंतकर्ता।
मुख्य भाव: शिव के संहार का अर्थ केवल भौतिक विनाश नहीं है। आध्यात्मिक अर्थ में यह अहंकार, मोह और बंधन के अंत का प्रतीक भी हो सकता है।
जयत्वदभ्र विभ्रम भ्रमद् भुजंगम श्वस,
द्विनिर्गमत् क्रम स्फुरत् कराल भाल हव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन् मृदंग तुंग मंगल,
ध्वनि क्रम प्रवर्तित प्रचंड तांडवः शिवः॥
Jayatv-adabhra-vibhram bhramad-bhujangam-shvas,
Dvinirgamat-kram-sphurat karaal-bhaal-havyavaat.
Dhimid-dhimid-dhimid-dhvanan mridang-tung-mangal,
Dhvanikram-pravartit prachand-taandavah Shivah.
अर्थ:
अब स्तोत्र में तांडव की गति और भी स्पष्ट हो जाती है।
सर्पों की गति, उनके फुफकारने की ध्वनि, ललाट की अग्नि और मृदंग की “धिमि-धिमि” ध्वनि—इन सबको एक साथ जोड़कर शिव के प्रचंड तांडव का दृश्य बनाया गया है।
यह श्लोक वास्तव में स्तोत्र की लयात्मक शक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है।
मुख्य भाव: शिव का तांडव ब्रह्मांडीय गति और परिवर्तन का काव्यात्मक प्रतीक बन जाता है।
दृषद् विचित्र तल्पयोः भुजंग मौक्तिक स्रजोर्,
गरिष्ठ रत्न लोष्ठयोः सुहृद् विपक्ष पक्षयोः।
तृणारविंद चक्षुषोः प्रजा मही महेंद्रयोः,
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्॥
Drishad-vichitra-talpayor bhujang-mauktik-srajor,
Garishth-ratna-loshthayoh suhrit-vipaksh-pakshayoh.
Trinaaravind-chakshushoh prajaa-mahee-mahendrayoh,
Samapravrittikah kadaa Sadaashivam bhajaamyaham.
अर्थ:
यह श्लोक बाहरी भेदभाव से ऊपर उठने की भावना प्रस्तुत करता है।
पत्थर और सुंदर शय्या, मूल्यवान रत्न और मिट्टी का ढेला, मित्र और शत्रु, साधारण व्यक्ति और महान राजा—इन सभी को समान दृष्टि से देखने की बात कही गई है।
भक्त पूछता है कि वह कब ऐसी समभाव वाली स्थिति प्राप्त करके सदाशिव की भक्ति करेगा।
मुख्य भाव: शिव-भक्ति का एक महत्वपूर्ण संदेश समत्व है—मूल्यांकन और अहंकार से ऊपर उठकर सभी में समान भाव देखना।
कदा निलिम्प निर्झरी निकुंज कोटरे वसन्,
विमुक्त दुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्।
विलोल लोल लोचनो ललाम भाल लग्नकः,
शिवेति मंत्र मुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥
Kadaa nilimp-nirjhari-nikunj-kotare vasan,
Vimukt-durmatih sadaa shirah-stham-anjalim vahan.
Vilol-lol-lochano lalaam-bhaal-lagnakah,
Shiveti mantra-muchcharan kadaa sukhee bhavaamyaham.
अर्थ:
भक्त की एक अत्यंत व्यक्तिगत इच्छा यहां सामने आती है।
वह पूछता है कि वह कब गंगा के पास किसी शांत स्थान में रहकर अपने गलत विचारों से मुक्त होगा, सिर पर हाथ जोड़कर शिव का ध्यान करेगा और लगातार “शिव” मंत्र का उच्चारण करेगा।
यहां बाहरी वैभव की अपेक्षा त्याग, ध्यान और आंतरिक शांति की इच्छा प्रमुख है।
मुख्य भाव: सच्ची भक्ति केवल बाहरी पूजा नहीं, बल्कि मन के परिवर्तन और शुद्धि से भी जुड़ी है।
निलिम्पनाथ नागरी कदंब मौल मल्लिका,
निगुम्फ निर्भर क्षरन् मधूष्णिका मनोहरः।
तनोतु नो मनो मुदं विनोदिनीम् अहर्निशं,
परश्रियः परं पदं तदंगज त्विषां चयः॥
Nilimp-naath-naagari-kadamb-maul-mallikaa,
Nigumph-nirbhar-ksharan madhooshneekaa-manoharah.
Tanotu no mano-mudam vinodineem aharnisham,
Parashriyah param padam tad-angaj-tvishaam chayah.
अर्थ:
इस श्लोक में शिव के मस्तक को सुगंधित पुष्पों और मालाओं से सुशोभित बताया गया है।
उनके दिव्य शरीर से निकलने वाला प्रकाश और सौंदर्य भक्त के मन में आनंद उत्पन्न करे—ऐसी प्रार्थना की गई है।
शिव के स्वरूप को परम पद और दिव्य तेज से जोड़ा गया है।
मुख्य भाव: शिव का स्वरूप यहां रौद्र तांडव से अलग एक दिव्य, सौंदर्यमय और आनंददायक रूप में सामने आता है
प्रचंड वाडवानल प्रभा शुभ प्रचारणी,
महाष्ट सिद्धि कामिनी जन आवहूत जल्पना।
विमुक्त वाम लोचना विवाह कालिक ध्वनिः,
शिवेति मंत्र भूषणा जगज्जयाय जायताम्॥
Prachand-vaadavaanal-prabhaa-shubh-prachaarani,
Mahaasht-siddhi-kaamini-janaa-vahoot-jalpanaa.
Vimukt-vaam-lochanaa-vivaah-kaalik-dhvanih,
Shiveti mantra-bhooshanaa jagaj-jayaay jaayataam.
अर्थ:
यह श्लोक शिव-मंत्र की शक्ति और उसके मंगलकारी प्रभाव की स्तुति करता है।
शिव का नाम यहां एक ऐसे आध्यात्मिक आभूषण के रूप में प्रस्तुत होता है जो जगत के कल्याण और विजय के लिए मंगलकारी हो।
“शिव” नाम स्वयं ही शुभता और कल्याण का प्रतीक माना गया है।
मुख्य भाव: शिव का नाम और स्मरण भक्त के लिए आध्यात्मिक आधार बनता है।
इमं हि नित्यमेवमुक्तम् उत्तमोत्तमं स्तवम्,
पठन् स्मरन् ब्रुवन् नरो विशुद्धिमेति संततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नाऽन्यथा गतिम्,
विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिंतनम्॥
Imam hi nityam evam-uktam uttamottamam stavam,
Pathan smaran bruvan naro vishuddhim-eti santatam.
Hare gurau subhaktim-aashu yaati naanyathaa gatim,
Vimohanam hi dehinaam Sushankarasya chintanam.
अर्थ:
यह श्लोक स्तोत्र के पाठ और स्मरण की महत्ता बताता है।
जो व्यक्ति इस उत्तम स्तोत्र को पढ़ता, स्मरण करता और उच्चारित करता है, उसके भीतर शुद्धि और भगवान शिव के प्रति भक्ति विकसित होने की बात कही गई है।
शिव का चिंतन मनुष्य के मोह और भ्रम को दूर करने वाला बताया गया है।
यहां स्तोत्र केवल पाठ करने की वस्तु नहीं, बल्कि मन को शिव के चिंतन की ओर ले जाने वाला साधन बन जाता है।
मुख्य भाव: नियमित स्मरण का उद्देश्य केवल बाहरी फल की इच्छा नहीं, बल्कि मन की शुद्धि और भक्ति की गहराई है।
पूजा वसान समये दशवक्त्र गीतम्,
यः शंभु पूजन परं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथ गजेंद्र तुरंग युक्तां,
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शंभुः॥
Pooja-vasaan-samaye Dashavaktra-geetam,
Yah Shambhu-poojan-param pathati pradoshe.
Tasya sthiraam ratha-gajendra-turang-yuktaam,
Lakshmim sadaiva sumukheem pradadaati Shambhuh.
अर्थ:
अंतिम श्लोक में इस स्तोत्र को दशवक्त्र, अर्थात दस मुख वाले रावण द्वारा गाया हुआ बताया गया है।
जो व्यक्ति शिव की पूजा के समय, विशेषकर प्रदोषकाल में, इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके लिए शंभु द्वारा स्थिर लक्ष्मी और समृद्धि प्रदान करने की प्रार्थना की गई है।
रथ, हाथी और घोड़े जैसे प्रतीक प्राचीन भारतीय संदर्भ में वैभव, संपन्नता और राजकीय समृद्धि के प्रतीक थे।
मुख्य भाव: अंतिम श्लोक स्तोत्र की फलश्रुति के रूप में आता है और शिव-भक्ति से प्राप्त होने वाली समृद्धि की कामना व्यक्त करता है।
निष्कर्ष
शिव तांडव स्तोत्र संस्कृत भक्ति-काव्य की उन रचनाओं में से है जिसमें शब्द, लय और भगवान शिव का विराट स्वरूप एक साथ दिखाई देता है।
परंपरा इसे रावण रचित मानती है और इसकी कथा भगवान शिव के प्रति रावण की गहरी भक्ति से जुड़ी हुई है। स्तोत्र में शिव की जटाओं में गंगा, मस्तक पर चंद्रमा, ललाट की अग्नि, गले में सर्प, डमरू और प्रचंड तांडव का अत्यंत प्रभावशाली वर्णन किया गया है।
लेकिन इसका सबसे महत्वपूर्ण संदेश केवल शिव के रौद्र रूप का वर्णन नहीं है। इसके भीतर भक्ति, समभाव, वैराग्य, मन की शुद्धि, ध्यान और कल्याण जैसे विचार भी दिखाई देते हैं।
इसीलिए शिव तांडव स्तोत्र को केवल एक धार्मिक स्तोत्र के रूप में नहीं, बल्कि संस्कृत काव्य की लयात्मक और चित्रात्मक शक्ति के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में भी देखा जा सकता है।
हर हर महादेव।