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धन, समृद्धि और सुख-शांति की देवी माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए सनातन परंपरा में जितने भी स्तोत्र रचे गए हैं, उनमें श्री सूक्तम् का स्थान सबसे प्राचीन और सर्वोच्च माना जाता है। यह केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि साक्षात वेदमंत्र है, इसलिए इसका पाठ अत्यंत फलदायी और शक्तिशाली माना गया है। इस लेख में हम श्री सूक्तम् का इतिहास, इसके प्रमुख मंत्र हिंदी अर्थ सहित, तथा शास्त्रोक्त जाप (चैंटिंग) विधि सब कुछ विस्तार से जानेंगे।
श्री सूक्तम् देवी श्री (लक्ष्मी) को समर्पित मंत्रों का समूह है, जो ऋग्वेद के खिल सूक्तों के अंतर्गत आता है। इसे लक्ष्मी सूक्तम् भी कहा जाता है। इसकी रचना ऋषि आनंद, कर्दम और चिक्लीत को दी जाती है।
मूल श्री सूक्तम् में 15 ऋचाएँ (मंत्र) हैं, 16वाँ मंत्र इसका फलश्रुति (पाठ के फल का वर्णन) है। बाद के काल में इसमें 11 अतिरिक्त मंत्र (17वें से 37वें तक) जोड़े गए, जिन्हें लक्ष्मी सूक्तम् (श्री सूक्त का परिशिष्ट) कहा जाता है। इस तरह पूर्ण पाठ में कुल 37 मंत्र मिलते हैं।
आंध्र प्रदेश के तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर में होने वाले 'तिरुमंजनम्' अभिषेक के समय पढ़े जाने वाले पंच सूक्तों में श्री सूक्तम् भी सम्मिलित है जो इसके महत्व को दर्शाता है।
मूल श्री सूक्तम् में कुल 16 मंत्र हैं — पहली 15 ऋचाएँ देवी लक्ष्मी के आवाहन और स्तुति की हैं, और 16वाँ मंत्र फलश्रुति (पाठ के फल का वर्णन) है। नीचे सभी 16 मंत्र संस्कृत में तथा हिंदी अर्थ सहित दिए गए हैं (कई प्रामाणिक स्रोतों से मिलान करके सत्यापित)।
हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् । चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१॥
अर्थ: हे जातवेदा (सर्वज्ञ) अग्निदेव! आप मेरे लिए स्वर्ण के समान कांतिमयी, सोने-चाँदी की माला धारण करने वाली, चंद्रमा के समान प्रसन्नकांति, हिरण्मयी लक्ष्मी देवी का आवाहन करें।
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् । यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥२॥
अर्थ: हे अग्निदेव! उन कभी न जाने वाली, स्थिर लक्ष्मी का मेरे लिए आवाहन करें, जिनकी कृपा से मुझे स्वर्ण, गौ, अश्व और उत्तम संतति की प्राप्ति हो।
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम् । श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥३॥
अर्थ: जो अश्वों को आगे किए, रथ के मध्य में विराजमान तथा हाथियों की गर्जना से जागृत होने वाली हैं, उन श्री देवी का मैं आवाहन करता हूँ। वे देवी मुझ पर प्रसन्न हों।
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् । पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥४॥
अर्थ: जो मंद-मंद मुस्कुराने वाली, स्वर्ण-प्राकार से घिरी, दयार्द्र, तेजस्विनी, तृप्त तथा तृप्त करने वाली और कमल पर स्थित पद्मवर्णा हैं, उन श्री देवी का मैं यहाँ आवाहन करता हूँ।
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् । तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥५॥
अर्थ: जो चंद्रमा के समान प्रकाशमान, यश से देदीप्यमान, संसार में श्री-स्वरूपा, देवताओं द्वारा पूजित तथा उदार हैं - उन कमलवासिनी देवी की मैं शरण लेता हूँ; मेरी अलक्ष्मी (दुर्भाग्य) नष्ट हो, मैं आपको ही चुनता हूँ।
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः । तस्य फलानि तपसानुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥६॥
अर्थ: हे सूर्य के समान वर्ण वाली देवी! आपके तप से उत्पन्न वृक्षों में श्रेष्ठ बिल्व वृक्ष हुआ; उसके फल मेरी भीतरी और बाहरी दोनों प्रकार की अलक्ष्मी (दरिद्रता) का तप द्वारा नाश करें।
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह । प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥७॥
अर्थ: हे लक्ष्मी! देवसखा (कुबेर) तथा कीर्ति (यश), मणि सहित मुझे प्राप्त हों। मैं इस राष्ट्र में प्रकट हुआ हूँ; वे मुझे कीर्ति और समृद्धि प्रदान करें।
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् । अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥८॥
अर्थ: हे देवि! क्षुधा-पिपासा रूपी मलिनता से युक्त अपनी ज्येष्ठ बहन अलक्ष्मी का मैं नाश करता हूँ। आप मेरे घर से समस्त अभाव और असमृद्धि को दूर करें।
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् । ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥९॥
अर्थ: जो सुगंध की द्वारभूता, दुर्जेय (अजेय), सदा पुष्ट तथा समस्त प्राणियों की ईश्वरी (अधिष्ठात्री) हैं, उन श्री देवी का मैं यहाँ आवाहन करता हूँ।
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि । पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥१०॥
अर्थ: मन की कामना और संकल्प, वाणी की सत्यता, पशुओं का रूप (गौ आदि) तथा अन्न — इन सबको मैं प्राप्त करूँ; श्री (समृद्धि) और यश मुझमें स्थिर हों।
कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भव कर्दम । श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥११॥
अर्थ: हे कर्दम (ऋषि)! आप मुझमें संतानरूप में प्रकट/उत्पन्न हों, तथा पद्ममालिनी माता लक्ष्मी को मेरे कुल में निवास कराएँ।
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे । नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥१२॥
अर्थ: जल स्निग्ध (पुष्टिकारक) पदार्थों की सृष्टि करे। हे चिक्लीत (लक्ष्मीपुत्र)! आप मेरे घर में निवास करें और माता लक्ष्मी को मेरे कुल में स्थापित करें।
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम् । चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१३॥
अर्थ: जो दयार्द्र, कमल-सरोवरवासिनी, पुष्टिस्वरूपा, पिंगल (स्वर्णाभ) वर्ण तथा पद्ममालाधारिणी और चंद्रमा के समान हिरण्मयी हैं, उन लक्ष्मी का मेरे लिए आवाहन करें।
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् । सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१४॥
अर्थ: जो दयार्द्र, गजयुक्त, आधार देने वाली (यष्टिरूपा), सुवर्णमयी, स्वर्णमाला धारण करने वाली तथा सूर्य के समान हिरण्मयी हैं, उन लक्ष्मी का मेरे लिए आवाहन करें।
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् । यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ॥१५॥
अर्थ: हे जातवेदा! उन कभी न बिछड़ने वाली लक्ष्मी का मेरे लिए आवाहन करें, जिनकी कृपा से मुझे प्रचुर स्वर्ण, गौएं, दासियाँ, अश्व और संतान की प्राप्ति हो।
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् । सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥१६॥
अर्थ: जो साधक नित्य पवित्र और संयमशील होकर घृत से हवन करता है तथा इन पंद्रह ऋचाओं का श्रद्धापूर्वक निरंतर पाठ (जप) करता है, उसकी श्री (लक्ष्मी) की कामना अवश्य पूर्ण होती है।
नोट: मूल श्री सूक्तम् इन्हीं 16 मंत्रों (15 ऋचा + 1 फलश्रुति) पर पूर्ण होता है। बाद के काल में इसमें 11 अतिरिक्त मंत्र (17-37) जोड़े गए, जिन्हें "लक्ष्मी सूक्तम्" (परिशिष्ट) कहा जाता है। जैसे प्रसिद्ध गायत्री रूप "महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि । तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥३४॥"। यह लेख मुख्यतः मूल 16 मंत्रों पर केंद्रित है।
शुभ समय: प्रातः सूर्योदय के समय अथवा सायं सूर्यास्त से पूर्व का समय श्री सूक्त पाठ के लिए सर्वोत्तम माना गया है।
शुभ दिन: शुक्रवार, गुरुवार, पूर्णिमा तथा दीपावली का दिन इस पाठ के लिए विशेष फलदायी माना जाता है।
श्री सूक्तम् केवल धन-प्राप्ति का साधन मात्र नहीं, बल्कि आत्मिक समृद्धि, स्थिरता और मन की शांति का भी स्रोत है। सही विधि, शुद्ध भाव और नियमितता के साथ किया गया यह वैदिक पाठ जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।