Pujaabhishekam Blog
आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहते है। इस दिन से भगवान विष्णु का शयन काल प्रारम्भ हो जाता है। इसलिए इसे देवशयनी एकादशी कहते है। पुराणों में वर्णन आता है कि भगवान विष्णु इस इसदिन से चार मासपर्यन्त (चातुर्मास )पाताल में राजा बलि के द्वार पर निवास करके कार्तिक शुक्ल एकादशी को लौटते हैं।इसी प्रयोजन से इस दिन को 'देवशयनी'तथा कार्तिकशुक्ल एकादशी को प्रबोधनी एकादशी कहते हैं। इस काल में यज्ञोपवीत संस्कार ,विवाह ,दीक्षाग्रहण ,यज्ञ ,ग्रहप्रवेश ,गोदान आदि जितने भी शुभ कार्य है वे सभी वर्जित होते हैं।
इस दिन पूरे मन और नियम से महीलाओं की प्राप्ति होती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार देवशयनी एकादशी का व्रत करने से सभी मनोकामनाऐं पूर्ण होती हैं।
शास्त्रों के अनुसार चातुर्मास में 16 संस्कारों का आदेश नहीं है। इस अवधि में पूजा ,अनुष्ठान ,घर या कार्यालय की मरम्मत ,गृहप्रवेश ,ऑटोमोबाइल खरीद और आभूषण की खरीद की जा सकती है।