देव दीपावली के दिन सर्वप्रथम स्नान आदि से निमृत हो कर के पूर्व दिशा के तरफ मुख करके बैठे और हाथ में जल लेकर संकल्प ले की मे अपने परिवार के कल्याण के लिए, सुख समृद्धि के प्राप्ति के लिए देव दीपावली के दिन तथा कार्तिक मॉस के शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तिथि के दिन सुख समृद्धि की प्राप्ति के लिए भगवान् विष्णु तथा शिव का पूजन आराधना करने जा रहा हूँ इसमें भगवान् विष्णु का पूजन होता है और साथ में पूरे कार्तिक माह में भोर में गंगा स्नान करने का विधान है गंगा स्नान करने से सभी प्रकार के रोगो और बीमारियों का विनाश होता तथा आरोग्यता की प्राप्ति होती है | शिव का पूजन इसलिए किया जाता देव दीपावली के दिन अर्थात कार्तिक मॉस के शुक्ल पक्ष के पूर्णिमा तिथि के दिन भगवान् शिव ने टीपुरा सुर का वध किया था इससे देवता गैन प्रसन्न हो करके पृथ्वी लोक पर आये और दिया जला करके अंधकार से प्रकाश की ओर असत्य पर सत्य के विजय के ख़ुशी में देवताओ ने हर्षोउल्लाष के साथ डीप जला करके दीपावली मनाई थी इसी दिन को पृथ्वीपर देव दीपावली कहा जाता है तो उस दिन पूर्व दिशा के तरफ मुख करके हाथ में जल लेकर के संकल्प करना चाहिए उसके पश्चात काठ की चौकी पर पीला वस्त्र बिछा करके भगवान् विष्णु का मूर्ति रख करके उसको पांच बार जल से स्नान करवाए उसके पश्चात पंचामृत से स्नान करवाए उसके बाद शुद्ध जल से स्नान करवाए उसके सुन्दर सुन्दर वस्त्र पहनाना चाहिए यगोपवीत चढ़ाना चाहिए उसके पश्चात उपवस्त्र चढ़ाना चाहिए फिर तीन बार आचमन करे भगवान् विष्णु को पीला चन्दन लगाए सुन्दर सुन्दर पुष्प मलये पहनाये पीला पुष्प भगवान् विष्णु को प्रिय है उससे अवस्य चढ़ाये ओर साथ में तुलसी की माला भी पहाये फिर तुलसी पत्र चढ़ाये ओर पीला पीड़ा चढ़ाये साथ में खीर पुवा नाना प्रकार के मिष्ठान को चढ़ाये उसके पश्चात धूप दिखाना चाहिए दीपक दिखाना चाहिए उसके बाद आचमन करे उसके बाद जो नवैद्य चढ़ाये है उसके ऊपर पांच बार आचमन करे उसके पश्चात फल चढ़ाये ताम्बूल चढ़ाये साथ में लौंग इल्लची ओर कड़ी ऊपरी चढ़ाये साथ में दक्षिणा भी चढ़ाना चाहिए साथ में दक्षिणा भी चढ़ाना चाहिए उसके बाद भगवान् से प्राथना करे हे भगवान् विष्णु नारायण हे डीनो की रक्षा करने वाले दीनानाथ स्वामी आप हमारे ऊपर प्रसन्न हो आप हमारे सभी परिवार के दुखो का नाश करे हमे सुख समृद्धि प्रदान करिये यह प्रातकालीन पूजा हो गया उसके पश्चात सायकाल में घी का दिया जलना चाहिए पूरे घर में घी का दिया जलना चाहिए साथ में अपने पूजा स्थल पर भी घी का दिया जलाये दो दरवाजे पर जलाये दीपक जलने से घर में सुख समृद्धि होती है जो दिया पूजा स्थल पर जलाया गया है उसका मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए अक्षत ओर पुष्प लेकर के दीपक से प्राथन करा चाहिए की हे दीप देवता आप उमरे घर में निवास करिये आपके कृपा से आपके प्रकाश से हमारे घरो के दुखो का नाश हो तथा हमारे परिवाए का कल्याण हो साथ में लक्ष्मी माता का आगमन हो क्यूंकि जिस घर में घी का दीपक जलाया जाता है वह भगवती लक्ष्मी प्रसन्न हो करके उस घर में निवास करती है ओर उस घर की साड़ी दरिद्रता दूर हो जाती है | दिया से प्राथन करने के पश्चात ॐ नमो भगवते वासुदेवाये या ॐ नमो नारायणाय या ॐ नमः शिवाये इन् मंत्रो का १०८ बार जाप अवस्य करना चाहिए जब करने के पश्चात जिस स्थान पर आप जप कर रहे है उसके सामने चमच से शुद्ध जल गिराए ओर दाहिने हाथ की अनामिका ऊँगली से तीन बार उस जल को अपने मस्तस्क पे लगाए इस प्रकार पूजा करने से भगवान् विष्णु भगवान् शिव साथ में माता लक्ष्मी प्रसन्न होती है ओर सारे देवता गण प्रसन्न हो करके पूजा करने वाले को सुख समृद्धि ओर आशीर्वाद प्रदान करते है |
तुलसी पूजा
इस वर्ष तुलसी विवाह ८ नवंबर २०१९ दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा | तुलसी विवाह कार्तिक मॉस के शुक्ल पक्ष के एकादशी तिथि को मनाया जाता है जिससे प्रमोदिनी एकादशी भी कहते है और विष्णु प्रमोदक उत्सव भी मनाया जाता है और ग्रामीण क्षेत्रो में इसको देव उठणी एकादशी भी कहते है | भगवान् विष्णु चार माह तक सोते है और कार्तिक शुक्ल पक्ष के एकादशी तिथि को वह अपने निद्रा से मानते है | उस दिन भक्तगण भगवान् विष्णु की पूजा पाठ करते है और तुलसी विवाह करते है इस विवाह को मानाने के पीछे एक कथा है प्राचीन काल में एक जलंधर नामक राक्षक था इसका जन्म समुन्द्र मंथन से हुआ था दैत्यराज जलंधर जो है ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त करके वह शक्तिशाली बन गया था और अपने प्रराक्रम देवलोक, पाताललोक और पृथ्वीलोक तीनो लोको को जीत लिया था उसके पत्नी का नाम था वृंदा यह वही वृंदा है जो अगले जन्म में तुलसी के पौधे के रूप में जन्म लिया था | वृंदा एक पति व्रता स्त्री थी उसके पति व्रत के कारण दैत्यराज जलंधर को कोई भी युद्ध में परास्त नहीं कर सका भगवान् विष्णु भी हार गए और भगवान् शिव भी उससे हार गए एक बार दैत्यराज जलंधर कैलाश पूरी पर आक्रमण किया और भगवान् शिव के साथ उसका गौर युद्ध हुआ भगवान् शिव गबरा गए इसका वध किस प्रकार किया जाये चुकी पति व्रत धर्म के कारण उसकी रक्षा होती थी और वृंदा हगवां विष्णु की परम भक्त थी अतः इंद्रा आदि देवता भगवान् विष्णु के पास गए और कहने लगे हे श्री हरी आप दैत्यराज जलंधर से हमारे प्राणो की रक्षा करिये भगवान् विष्णु ने कहा हे देवताओ लोहा लोहे से कटता है इसलिए अब छल करना पड़ेगा क्यूंकि जब तक उसके पत्नी का पति व्रत धर्म नष्ट नहीं होगा तब तक उसका कोई वध नहीं कर पाएगा अतः भगवान् विष्णु ने दैत्यराज जलंधर का रूप धारण करके वृंदा के पास गए वृंदा ने देखा की यह मेरे पति है तो उसने उन्हें प्रणाम किया और दोनों हाथो को पकड़ कर कहा हे स्वामी आप कब आये जो हे उसने दोनों हाथो को पकड़ा पर पुरुष के उसी समय भगवान् शिव ने अपने त्रिशूल से दैत्यराज जलंदर का वध कर दिया और उसी समय जलंदर का सर कट करके वृंदा से समूह आ पड़ा वृंदा देख कर गबरा गयी और भगवान् जलंधर के रूप में थे उनको छोड़ कर किनारे हो कर बोली आपको कौन है ? उसी समय भगवान् विष्णु अपने चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए और चुप चाप कड़े हो गए वृंदा ने कहा हे मेरे इष्ट मेरे पूजनीय मई आपकी परम भक्त हूँ परन्तु आप मेरे पति व्रत धर्म को नष्ट कर दिया ऐसा क्यों किया मैंने ऐसा कोई अपराध भी नहीं किया आपकी मई तोह परम भक्त हूँ परन्तु भगवान् विष्णु ने कुछ नहीं बोला उसी समय वृंदा को क्रोध आ गया और उसने कहा जिस प्रकार आप पत्थर के समान कड़े है आप वैसे ही हो जाये जैसे आप कड़े है उसी समय भगवान् विष्णु पत्थर के समान कड़े हो गए तीनो लोको में हाहाकार मच गया ब्रह्मा इत्यादि देवता वृंदा के सामने प्रकट हुए बोले हे देवी यह जो तुम्हारा पति है वह बहुत हे अत्याचारी है इसने अपने पराक्रमण से तीनो लोको को दुःख दे रहा था इसलिए इसका वध करना अनिवार्य हो गया था परन्तु तुम्हारे पति व्रत धर्म के कारण इससे मारना संभव नहीं था इसलिए भगवान् नारायण ने तीनो लोको की रक्षा करने के लिए छल किया इसलिए हे देवी आप के अपना श्राप वापस ले ले स्वयं भगवती लक्ष्मी भी आयी वृंदा के सामने क्यूंकि लक्ष्मी जी का जन्म समुन्द्र मंथन से हुआ था इसलिए जलंधर लक्ष्मी जी को बहन मानता था और जलंधर का जन्म भी समुन्द्र मंथन से हुआ था तोह लक्ष्मी जी ने कहा हे भाभी मई आपके पति की बेहेन हूँ अतः आप मेरे रक्षा करिये मई आपकी शरण में आयी हूँ तोह वृंदा ने कहा मई एक पति व्रता स्त्री हूँ मेरा पति व्रत धर्म नष्ट हो गया अब मुझे कौन अपनाएगा मरने के बाद मुझे अपयश प्राप्त होगा तब भगवान् विष्णु ने कहा हे देवी जब तुम इस शरीर cका त्याग कर दोगी उसके पश्चात तुम तुलसी के रूप पौधे के रूप में इस पृथ्वी पर उत्पन्न हो जाओगी | उस समय तुम्हारा श्राप खाली नहीं जाएगा मई पत्थर का सालिग्राम बन जाऊंगा और सालिग्राम के साथ तुलसी के पौधे का विवाह होगा उस समय में तुम्हे अपना लूंगा जब मई तुम्हे अपना लूंगा तो साड़ी सृष्टि तुम अपना लेगी उन्होंने कहा तुम्हारा गुण तीनो लोको में फ़ैल जाएगा तुम्हारे अंदर बहुत शक्तिया होंगी | तुलसी के पौधे को लक्ष्मी जी के समान पूजनीय माना जाएगा जो तुम्हारी मंजरी होगी वह कौस्तुभ मणि के समान मेरे लिए प्रिय होगी कोई भी मनुष्य हजारो पाप करे परन्तु मरते समय तुलसी तुलसी बोल देगा या मीत व्यक्ति के मुख में तुलसी की पट्टी को दाल दिया जाए गंगा जल के साथ या शुद्ध जल के साथ तोह तुम उससे इस भवसागर से मोक्ष की प्राप्ति करा दोगी तुम्हारे पति व्रत तपस्या का जो फल है वह तुम्हारे पत्तो में विधमान रहेगा उस पुन्हः के प्रभाव से उस मित व्यक्ति भी मोक्ष को प्राप्त कर लेंगे या हरी प्रिय कह करके भक्त गण तुलसी के पत्तो को भगवान् सालिग्राम को चढ़ाएंगे तोह तुम्हारी यश तीनो लोको मई फ़ैल जाएगी तुम सदा सदा के लिए तीनो लोको में पूजनीय हो जाउंगी देवलोक और मानवलोक में तुम्हारी पूजा होगी और कहा तुम संसार का कल्याण करोगी और जो व्यक्ति प्रमोदिनी एकादशी के दिन पूरे विधि विधान से सालिग्राम और तुलसी का विवाह करेंगे उनकी साड़ी मोकामना पूर्ण होगी क्यूंकि उस दिन भगवान् विष्णु को निद्रा से जगाया जाता है | सालिग्राम और तुलसी विवाह विधि सबसे पहले सालिग्राम लेकर और तलसी के पौधे को लेकर जल से आचमन किया जाता है उसके पश्चात पंचामृत चढ़ा जाता है पुनः शुद्ध जल से स्नानो gr कराया जाता है फिर सुन्दर सुन्दर वस्त्र चढ़ाये जाते है और तुलसी जी को साड़ी चढ़ाया जाता है उसके बाद यज्ञोपवीत चढ़ाये जाते है फिर उपवस्त्र चढ़ाया जाता है चन्दन चढ़ाना चाहिए अक्षत की जगह सफेद टिल चढ़ाया जाता है सुन्दर सुन्दर पुष्प माला चढ़ाना चाहिए दूप डीप नैवैद्य दिखा करके आचमन करना चाहिए उसके पश्चात फल चढ़ाना चाहिए ताम्बूल पत्र के साथ लौंग इलाइची चढ़ाना चाहिए साथ में दक्षिणा भी चढ़ाना चाहिए इसमें विशेष गन्ने को चढ़ाया जाता है क्यूंकि कार्तिक अहिना जब प्रारम्भ होता है तो सभी देवता गण पृथ्वी पे आते है और गन्ने के रस के ग्रहण करते है और उससे प्रसन्न हो कर पृथ्वी वासियो को आशीर्वाद देकर चले जाते है इसलिए विष्णु जी के साथ माता तुलसी की पूजा करने से स्तरीया सौभाग्यवती होती है पुरुष लक्ष्मीवान होता है ऐसा शास्त्रों में वर्णित है |
इस वर्ष करवा चौथ व्रत १७ अक्टूबर २०१९ दिन गुरुवार को पड़ रहा है इस व्रत को सुहागिन स्तरीया बड़े धूम धाम से मनाती है | कास कर भारत के पक्षिम प्रदेश राजस्थान, पंजाब, हरयाणा , गुजरात और दिल्ली आदि सारे भारत में इस व्रत को स्तरीया करती है यह व्रत चन्द्रमा और गणेश जी के लिए किया जाता है पाती के दृग आयु के लिए सुहागिन स्तरीया इस व्रत को करती है यह व्रत जो है बारह वर्ष या सोलह वर्षो तक लगातार करना चाहिए | करवा चौथ नामक एक देवी है उन्ही जे नाम पर यह व्रत किया जाता है इनका मंदिर राजस्थान के स्वाही माधोपुर नामक जिले में स्तिथ है यहाँ पर स्तरीया जो है चौथ माता का दर्शन और पूजन करती है इसके बाद चन्द्रमा को अर्घ देने का विधान है स्त्रीया जो है दिन भर उपवास करती है और रात्रि में जब चन्द्रमा का उदय होता है तो उस समय चंद्रदेव को अर्घ दे कर के चन्द्रमा का दर्शन करती है उसकी पश्चात भोजन ग्रहण करती है यह व्रत का विधान है इसके पीछे एक कथा भी है | एक साहूकार के साथ बेटे और एक पुत्री थी उस पुत्री का नाम था करवा साहूकार के जो सात बेटे थे वह अपनों छोटी बहन से बहुत प्रेम करते थे जब साथ में खाना खाते तो सबसे पहले अपने छोटी बहन को खिलाते उसके बाद तब स्वयं खाते थे जब उसकी शादी हो गयी शादी के पश्चात वह ससुराल चली गयी और कुछ वर्षो बाद मायके आयी तो साहूकार के सातो बेटे भोजन करने बैठे थे उसी समय उसकी बहन भी वह बैठी थी भूखी प्यासी सातो ने कहा भोजन कर लो बहन तो उसने कहा हे भाई आज में व्रत हूँ करवा चौथ का चन्द्रमा का दर्शन करने के बाद हे मैं भोजन ग्रहण करुँगी ऐसा सुन्न कर वह बहुत दुखी हुए तो उनमे से सबसे छोटे वाले भाई ने एक घी का दीपक जलाया और एक पीपल के वृक्ष पर रख दिया और उसके आगे एक चलनी रख दिया दूर से देखने में ऐसा प्रतीत होने लगा की चनद्रम उदय हो गया है और वह जा कर के अपनी छोटी बहन से कहता है की हे बहन देखो चंद्र देव उदय हो गए है अब तुम उनका दर्शन कर के पूजन कर के पूजन कर लो छोटी बहन प्रसन्ता पूर्वक सीढिया चढ़ कर के जब देखि प्रकाश का प्रतिबीम तो उससे लगा की चन्द्रमा उदय हो गया अतः चन्द्रमा को अर्घ दे कर के वह pranam कर के भोजन करने बैठी तो उसने पहला खौर उठाया खाने के लिए तोह उससे झीक आ गयी उसके बाद दूसरा खौर उठायी तो बाल निकल आया उसके बाद तीसरे खौर में उससे समाचार मिला की तुम्हारे पति की मित्यु हो गयी है अतः वह दुखी हो कर के विलाप करने लागिबोर अपने पति के सव के पास बैठ कर के प्रतिज्ञा की की जब तक मैं अपने पति को जीवित नहीं कर लुंगी तब तक मैं अन्य और जल का त्याग करुँगी उसके छोटे भाई की पत्नी ने उससे सारी बात बतला दी थी चंद्रदेव उदय नहीं हुए थे तुम्हारे छोटे भाई ने घी का दीपक जला कर के चलनी से धक् कर रख दिया था उससे देख कर मालुम हुआ की चन्द्रमा उदय हो गया है तुम्हारा व्रत खंडित हो गया यह सब सुन्न कर उससे बहुत दुःख हुआ वह प्रतिज्ञा की की मैं करवा चावत का व्रत करूंगी और अपने पति को जीवित करुँगी यह संकल्प के साथ वह अपने पति के सव की सेवा करने लगी | धीरे धीरे सूई नुमा घास उसके पति के शरीर पर उगने लगे उन् घासो को वह नोच कर के वह इक्कठा करने लगी इस प्रकार जब साल भर बीत गया तो करवा चौथ के दिन उसने व्रत किया उसकी भाभियाँ उसके पास जब आशीर्वाद लेने के लिए आयी तो वह कहने लगी की हे भाभी यह सुई लेलो यानि याम सुई लेलो प्रिय सुई देदो और मेरे पति को जीवित करो सभी भाभियाँ गबरायी और ताल मतूल करने लगी बड़ी ने कहा तुम छोटी के पास जाओ और छोटी ने कहा तुम उससे छोटी के पास जाओ इस प्रकार छह भाभियाँ चली गयी लेकिन छठी भाभी ने कहा जो सबसे छोटी भाभी है तुम उनसे यह बात कहो क्यूंकि उन्ही के पति के कारण तुम्हारे पति की मृत्यु हुई है और वह पति व्रता है और यदि वह चाहेगी तो तुम्हारा पति जीवित हो जाएगा | तुम उसके पैर पड़ कर बैठ जाना जब छोटी भाभी आयी आशीर्वाद लेने के लिए तो उसने कहा हे भाभी यम सुई लेलो प्रिय सुई देदो मेरे पति को चिरंजीवी बनाओ तोह उसने कहा मैं कैसे तुम्हारे पति को जीवित करुँगी पर वह उसके पैर पकड़ कर बैठ गयी और रोने लगी उससे देख कर वह भी द्रवित हो गयी फिर उसने अपनी कानि ऊँगली को चिर कर उसमे से एक बूँद खून उसके पति के मुख में डाला क्यूंकि उसके कानि ऊँगली में भगवान् के आशीर्वाद से अर्घ अमृत का निवास था उसका पति जो है वह जीवित हो उठा उसके पश्चात तबसे यह करवा चौथ का व्रत भारत में प्रचिलित हो गया | पति के जीवित होने के बाद उसने भगवान् गणेश की विधि विधान से पूजन किया चन्द्रमा का पूजन किया और सबलोग साथ में बैठ कर भोजन ग्रहण किये यह चतुर्थी तिथि के देवता यानि गणेश जी के होते है उसी दिन किया जाता है उसके बाद चन्द्रमा को जल देना चाहिए उस दिन सुहागिन स्तरीया चन्द्रमा के उदय होने के बाद चलनी इ चन्द्रमा का दर्शन करती है कही कही लोग अपने पति के मुख का दर्शन करती है उसके बाद पति अपने हातो से जल पिलाते है और वह अपने पति के साथ प्रसाद ग्रहण करती है इस व्रत को करने से सुहनगिन स्त्रीयो की पतियों की आयु बढ़ती है और वह इस पृथ्वी पर सारे सुखो का उपभोग करके मरने केपश्चात यह लोग भगवान् गणेश के प्रणाम धाम को चले जाते है अपने कर्मा अनुशार कुछ विष्णु लोक को जाते है और कुछ लोग शिव लोक कोचले जाते है माता पार्वती parsanna हो करके उन् सुहनगिन स्त्रीयो को आशीर्वाद प्रदान करती है |
जीवित पुत्रिका व्रत का महत्व और पूजा विधि
जीवित पुत्रिका व्रत स्त्रीयो का सर्वोत्तम व्रत है जिसमे संतान की प्राप्ति के लिए और सांता के जीवन दान के लिए लम्बी आयु की कामना के लिए स्त्रीया जो है निराजल व्रत रहकर जीवित पुत्रिका का व्रत रहती है | मंगल करनेवाले भगवन श्री राम चंद्र जी का आप सभी लोग का मंगल करे इस वर्ष जीवित पुत्रिका का व्रत २२ सितम्बर २०१९ दिन रविवार को पड़ेगा और जीवित पुत्रिका का व्रत का पारण २३ सितम्बर २०१९ दिन सोमवार प्रातकाल किया जाएगा जीवित पुत्रिका का जो यह व्रत है यह पुत्र या पोत्रो की आयु की वृद्धि के लिए स्तरीया यह व्रत को करती है | भारत देश में पूर्वी राज्यों जैसे बिहार, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश तथा बंगाल, ओर्रिसा आदि राज्यों में बड़े धूम धाम से यह व्रत को मनाया जाता है | इस व्रत का एक कथा है एक गंदर्भ राजकुमार जिसका नाम था जीमूत वाहन यह गंधर्बो के राजकुमार थे | जीमूत वाहन के पिता जब वृद हो गए तो उन्होंने अपने बड़े बेटे को जीमूत वाहन को गद्दी पर बैठा करके वानप्रस्त ये जंगल में तपस्या करने के लिए चले गए कुछ वर्षो तक जीमूत वाहन ने धर्म पूर्वक प्रजाओं का पालन किया और राज काज में उसका मन नहीं लगा अतः अपने पिता जी की सेवा करने के लिए अपने छोटे भाई को सिंघासन पर बैठा कर वह भी जंगल में चला गया उनके पत्नी का मलयवती था वह अपने पिता का सेवा सत्कार करने लगे एक दिन जीमूत वाहन जंगल में हवन करने के लिए पुष्प सविधा लेने के लिए गए थे तो टहलते हुए सायकाल को एक नदी के किनारे पहुंचे वहा पर उन्होंने देखा एक वृद्ध स्त्री रू रही है जीमूत वाहन वह पहुंच कर उससे पूछे की हे देवी आप कौन है उन्होंने कहा हे महा पुरुष मे नागवंश की स्त्री हूँ और मेरे रोने का कारन यह है की नागो ने गरुण वचन दिया है की आपको प्रतिदिन एक नाग बालक खिलाया जाएगा क्योंकि गरुण के भये से नाग लोग पृथ्वी और पातळ लोक जा कर छिप गए तो नागो ने प्राथना किया तो गरुण कहा की तुम लोग प्रतिदिन मुझे एक नाग बालक को खिलाओगे तो में तुम्हारा वध नहीं करूँगा वचन के अनुशार वह स्त्री बोली की आज मेरे पुत्र का समय है और यह जो सीला पठ रखा हुआ है इसी पर लाल वस्त्र में धक् कर अपने पुत्र को सुलाउंगी और गरुण देव आ कर मेरे बच्चे को को खा जाएंगे इसलिए मे रू रही हूँ की मेरे पुत्र की रक्षा कैसे होगी जीमूत वाहन ने कहा हे देवी आप चिंता मत करिये आज आपके पुत्र की जगह मई जाऊंगा और वचन अनुशार जीमूत वाहन जो है उस नाग बालक की जगह पर स्वयं लेट गए कुछ समय बाद गरुण जी अपनी लम्बी उड़ान उड़ते हुए अपने पंख के झपाके से उस स्व को उठाते हुए आकाश में उड़ गए और एक पर्वत के ऊपर जा कर उसक मॉस खाने लगे तो जब आधा अंग कह गए तो तो गरुण जी देखा की आज तक मैंने जिन नाग बालको को खाया है वह रोने लगते थे चिलाने लगते थे उनका झटका देने लगता था यह कौन है जो न रू रहा है और न हे झटका दे रहा है जब उन्होंने उसके चेहरे से पर्दा हटाया तो पूछा की तुम कौन हो तो राजा जीमूत वाहन ने सभी पहले की बाते बतला दी तो गरुण जी बहुत प्रसन्न हुए और बोले हे वीर मे तुम्हारी वीरता से प्रसन्न हूँ तुम्हारे अंगो कमाई कह रहा था तो एक नाग बालक को जीवन दान देने के लिए रोये भी नहीं तुम्हारे जैसा वीर इस पृथ्वी पर होना असंभव है इसलिए मई तुम पर प्रसन्न हो कर वर देता हूँ तो उन्होंने कहा गरुण जी आप मेरी वीरता से अगर प्रसन्न हुए है तो आप मुझे वचन दीजिये की आज के बाद आप किसी भी नाग बालकको नहीं खाएंगे तो गरुण जी कहा ऐसा ही होगा उसके बाद गरुण जी ने कहा हे राजन मे तुम्हे आशीर्वाद देता हूँ की आज के दिन जो लोग तुम्हारे नाम से यानि जीमूत वाहन (जीवित पुत्रिका) के नाम से व्रत जो स्तरीया करेंगी उनके बालोको कि आकाल मृत्यु नहीं होगी इसलिए उस दिन से प्रत्येक स्तरीय जो है अश्विनी मॉस के कृष्ण पक्ष के अष्टमी तिथि को इस व्रत को करती है और नौवीं तिथि को पारण करती है और इसमें नियम है की बिना कहए पिए इस व्रत को किया जाता है इसमें जल भी नहीं पिया जाता है निराजल हो कर विधि पूर्वक व्रत करने से साये काल इसका कथा होता है फिर दूसरे दिन व्रत का पारण किया जाता है व्रत का पारण करने के लिए नियम है स्नान आदि से निमृत हो कर और जो ब्राह्मण गरीबो को दान करके उन्हें भोजन करा कर के अब बाद में व्रत का पारण करना चाहिए ऐसा करने से उस स्त्री की मनोकामना पूर्ण होती है भगवन गरुण देव की कृपा से उसके पुत्र पोत्र पुत्रिकुल आदि की वृद्धि होती है और यह द्रिगायु होते है इसलिए इस व्रत का नाम जीवित पुत्रिका है |
पितृ पक्ष कब से शुरू और पूजा विधि
इस वर्ष पितृ पक्ष १४ सितम्बर २०१९ दिन शनिवार को पितृ पक्ष प्रारम्भ हो रहा है कहा गया है शास्त्रों में की भाद्रपद के शुक्ल पक्ष के पूर्णिमा तिथि से पितरो का दिन प्रारम्भ होता है जो असिन मॉस के कृष्ण पक्ष के अमावस्या तक रहता है | मनु स्मृति के अनुसार मनुष्यो के एक महीना पितरो का एक दिन होता है वो भी रात्रि | पितरो का जो दिन है वह कृष्णा पक्ष कहा जाता है और उनकी जो रात्रि है शुक्ल पक्ष कहा जाता है इसलिए कृष्ण पक्ष में पितरो का श्राद करने का विधान है | शास्त्रों के अनुशार श्रद्धा से हे श्राद शब्द की उत्पत्ति हुई है | श्राद जो है श्रद्धा पूर्वक करना चाहिए आगे कहा गया है की जो लोग अपनी मृत पृत्र गण की श्रद्धा पूर्वक पूजा करते है उससे श्राद शब्द से जाना जाता है इसे पितृ यज्ञ भी कहते है जो लोग श्रद्धा पूर्वक अपने पितरो को प्रसन्ना करने के लिए पूजा करते है उससे श्राद कहा गया है आगे सपतप ब्राह्मण में आया है की पितृ गण अपने भाग को कैसे ग्रहण करते है तो जब आप श्राद करने के बाद ब्राह्मणो को भोजन करते है तो जो मित्र पितृ गण है वह वायु का रूप धारण कर लेते है और उनकी गति मन से भी तेज़ होती है तो जब आप ब्राह्मणो को बुला कर पितृ पक्ष में भोजन करते है तो आप के पितृ गण वायु रूप धारण कर के उनके पंक्तियों के बीच में आ कर बैठ जाते है और भोजन के रस से तृप्त हो कर श्राद करता को मनोकामना पूर्ण आशीर्वाद प्रदान करते है आगे कहा गया है की श्राद करने से पितृ गण प्रसन्ना हो कर आयु , विद्या, धन, और स्वर्ग मोक्ष को भी प्रदान करते है | महिर्षि जवायु ने कहा है की श्राद करने से पितृ गण प्रसन्ना हो कर के पुत्र प्रदान करते है आयु देते है आरोग्यता देते है तथा धन धान्य भी देते है इसलिए श्राद को श्रद्धा पूर्वक करना चाहिए बहुत से लोग यह सोचते है की श्राद करने से पिंड दान करने से मरे हुए लोगो को यह सब कैसे प्राप्त होगा | देखिये जो मनुष्य पूर्ण आत्मा होता है वह अपना शरीर त्याग कर के वह देव योनि में चला जाता है तो उनके वंसज जो है श्राद करते है वह अमृत रूप में उन्हें देवलोको में प्राप्त होता है और जो लोग अपने कर्मा अनुशार मनुष्य योनि में आये है तोह उनके वंसज जो श्राद करते है वह अन्य रूप में उन्हें पृथ्वी पे प्राप्त होता है वह मनुष्य को प्राप्त होता है और जो पशु योनि में चले गए है कर्मा अनुशार उन्हें जो है घास के रूप में वह पिंड दान और श्राद का फल प्राप्त होता है अब लोग सोचते है की उन पितृ अलग अलग योनि में चले गए है और हम यहाँ पे श्राद कर रहे है और उन्हें वह फल कैसे प्राप्त होगा तोह हमारे शास्त्रों में कहा गया है की जिस प्रकार गौशाला में हजारो गाये रहती है और गाये के बछड़ो को खोल दिया जाता है परन्तु जब उन्हें भूख लगती है तो अपनी माँ को उन् हजारो गया के बीच में ढूंढ लेता है और जा कर के दूध पीटा है ठीक उसी प्रकार मंत्रो के द्वारा जो पिंड दान किया जाता है उस मंत्र के प्रभाव से पिंड धन करने वाले का जो वह फल अपने पितरो को पहचान कर की उनके पितृ किस योनि मेहै गारा देव योनि में है तोह अमृत रूप में अगर मनुष्य योनि मे है तो भोजन रूप मे अगर पशु योनि में है तोह उन्हें घास के रूप में यदि सर्प योनि में चले गए है तो उन्हें हवा के रूप में प्राप्त होगा इस प्रकार ब्रह्मा के सृष्टि में जिनका जीवोकोपर्जन के लिए और दीर्घ आयु के लिए जीवन को जीने के लिए जो जो सामग्रियां बनायीं गयी है जैसे कुछ अन्य खाते है कुछ पानी पर निर्भर रहते है कोई हवा पे निर्भर रहता है इस प्रकार वह वास्तु उन्हें उसी रूप में प्राप्त होता है इसलिए श्रद्धा पूर्वक श्राद करना चाहिए और जो लोग श्राद नही करते है उन्हें शास्त्रों में कहा गया है की ऐसे लोगो के पितृ गण नाराज़ हो जाते है और नाराज़ हो कर अपने पुत्र पुत्र आदि के रक्त का पान करते है और श्राप देते है की जाओ तुम दुखी हो जाओ उनके खुल में कोई संतानं नहीं होता है उनकी उन्नति नहीं होती है घर में शांति नहीं रहता हमेशा कलह कलेश रहता है हमेशा परेशानी रहती है इसलिए कहा गया है की हजारो पुत्रो में से एक ही पुत्र अच्छा है जो अपने पितरो को तृप्त कर दे इसलिए लोग पुत्र उत्पन्न करते है क्यूंकि कान्ये जो है वह छह पीढ़ियों का उद्धार करती है | परन्तु पुत्र जो है अपनी पूर्वजो का उद्धार करता है अगर आपके पास धन नहीं है आप बहुत गरीब है तो आप श्राद कैसे करेंगे शास्त्रोंही हो में कहा गया है की यदि आपके पास वास्तव में धन नहीं है आप बहुत गरीब है तो किसी एकांत जगह पे जाए जिस दिन आपके पिता की तिथि हो या नदी के किनारे जाये या जंगल में जाए या घर में ही कही एकांत स्थान में और अपने दोनों हाथो को ऊपर कर लीजिये और दक्षिण दिशा के तरफ मुख कर के प्राथना करिये और कहिये की हे पितृ गणो मेरे पास धन नहीं है न श्राद करने के लिए कोई योग वस्तु है इसलिए हे मेरे पृतो आप जिन जिन लोको में हो आप लोगो को में श्रद्धा पूर्वक हाथ जोड़कर प्राथना करता हूँ की आप मेरे पर कृपा करे और मेरे पूजा को प्राप्त करे क्योंकि आपके प्रति मेरे पास सिर्फ श्रद्धा है और इस श्रद्धा से आप तृप्त हो करके अपने लोको में सुखो को भोग करिये जब मेरे पास धन धान्य होगा तब में विधि पूर्वक श्राध्द करूँगा वर्त्तमान में मेरे पास आप लोगो के लिए पूर्ण श्रद्धा है और भक्ति है उस श्रद्धा और भक्ति के द्वारा ही आप लोग मेरे पूजा स्वीकार करे इसके बाद हाथ जोड़कर पृथ्वी को प्रणाम करना चाहिए इससे भी परित्र गण संतुष्ट होते है देखिये आप हजारो रुपये खर्चा कर दीजिये और आपके मैं में श्रद्धा न हो तो वह श्राद को पृत्र गण भी प्राप्त नहीं करते है देखिये देवताओ के पूजन में यदि आपको मंत्र नहीं आ रहा हो तो भी पूजा पाठ करने के बाद आप क्षमा प्राथना बोल देते है या आप उनका आरती करते है तो प्राथना से देवता प्रसन्नहो जाते है परन्तु पितृ गण सब्दो से संतुष्ट होते है यदि आपके मन में श्रद्धा रहेगा और साथ में शुद्ध शुद्ध मंत्रो के द्वारा श्राद्ध किया जाएगा तब ही वह पितृ उस भाव को ग्रहण करेंगे यदि आप में श्रद्धा नहीं होगा और शुद्ध शुद्ध मंत्रो का उपचारां नहीं होगा तो पितृ गण श्राद करता के फल को ग्रहण नहीं करते है और फल भी नहीं देते है इसलिए जो योग ब्राह्मण हो और शुद्ध शुद्ध मंत्रो का उपचारां करने वाला हो उसी से श्राद कर्म करना चाहिए और श्राध्द में नौ ब्राह्मणो को भोजन करने का विधान है यदि नव ब्राह्मण न मिले तो तीन ब्राह्मण और तीन न मिले तो एक ब्राह्मण को भोजन करना चाहिए वह भी ब्राह्मण शुद्ध होना चाहिए वेद पाठी होना चाहिए और संधया करने वाला होना चाहिए साथ में सुन्दर भी होना चाहिए क्यूंकि आइए ब्राह्मण के पीछे हवा रूप में आपके पितृ गण भी आते है और जब ब्राह्मण संतुष्ट हो तो आपके पितृ गण भी संतुष्ट हो जाते है और आपको आशीर्वाद प्रधान करते है |
सोमनाथ ज्योतिलिंग महत्व और इतिहास
सोमनाथ का अर्थ है सोम अर्थात चन्द्रमा नाथ का अर्थ है स्वामी | चन्द्रमा का जो स्वामी है उसका नाम सोमनाथ है यह सोमनाथ ज्योतिलिंग गुजरात के प्रभास क्षेत्र में समुन्द्र तट पर स्तिथ है इस मंदिर का निर्माण स्वयं चंद्र देव ने करवाया था | यहाँ पर भगवान् शिव का विग्रह अर्थात तेज़ स्वयंभु शिवलिंग के रूप मे प्रकट हुआ इसलिए इसका नाम सोमनाथ ज्योतिलिंग पड़ा | सोमंथ ज्योतिलिंग क्यों पड़ा इसके बारे में शिव महा पुराण में एक वर्णन है प्रजापति दक्ष की बाइस कन्याये थी प्रथम पुत्री का विवाह उन्होंने भगवान् शिव के साथ करा दिया बाकि शेस कन्याओं के साथ चन्द्रमा के साथ पानी ग्रह संस्कार करवाया चंद्रदेव जो है रोहिणी से बहुत प्रेम करते थे चुकी रोहिणी बहुत सुन्दर थी और जो शेष उनकी पत्निया थी उन् सभी से चन्द्रमा को उतना प्रेम नहीं था तो सभी कन्याये दुखी होक अपने पिता के पास गयी और प्रजापति दक्ष से उन्होंने कहा हे पिता जी हमारे पति चंद्रदेव हमलोगो का सम्मान नहीं करते है प्रजापति दक्ष इस बात को सुन्न कर बहुत क्रोधित हुए और अपने सभी कन्याओं को अपने घर बुलवा लिया परन्तु चन्द्रमा जो है रोहिणी से प्रकांड प्रेम करते थे उनके प्रेम से वसीभूत हो कर के चंद्रदेव जो है अर्धरात्रि के समय सूक्श्म रूप धारण कर के रोहिणी के कमरे में प्रकट हुए रोहिणी अपने पति को देखकर बहुत प्रसन्न हुई दोनों में वार्तालाभ हो ही रहा था उसी वार्तालाभ को सुन्न कर के प्रजापति दक्ष जग गए और वो उसके कक्ष में गए वह पर जा कर उन्होंने देखा की चन्द्रमा और रोहिणी दोनों एक दूसरे से वार्तालाभ कर रहे है यह डेक कर के वह बहुत क्रोधित हुए और चन्द्रमा को उन्होंने श्राप दे दिया और कहा हे चंद्र देव तुम्हे अपने सुंदरता पे बाहर गर्व है अहंकार है इसलिए मे तुम्हे श्राप देता हूँ की आज से तुम क्षय रोगी हो जाओगे और श्याम वर्ण के हो जाओगे क्यूंकि चन्द्रमा शुक्ल वर्ण के थे इसलिए वह काले रंग के हो गए चन्द्रमा श्रापित हो कर के अपने माता पिता के पास गए उनकी माता का नाम था अनसुइया और पिता का नाम था अत्रिऋषि अतः अनसुइया जी ने कहा हे पुत्र तुम गुजरात क्र प्रभास क्षेत्र में जा कर के समुन्द्र के तट पर भगवान् शिव का तप करो | महा मृतुन्जय के मंत्रो से माता की आज्ञा पा कर के चंद्रदेव प्रवास क्षेत्र में जा कर के समुन्द्र तट के किनारे बैठ कर के महा मृतुन्जय के मंत्रो का घोर जप किया और घोर तपस्या किया इस तपस्या के प्रभाव से भगवान् शिव प्रसन्ना हुए और चांदेव को उन्होने साक्षत दर्शन दिया चन्द्रमा ने कहा हे प्रभु यदि आप मुझ पर प्रसन्न हो तो मेरे इस रोग को दूर करिये भगवान् शिव ने कहा हे चंद्रदेव किसी भी देवी देवता ऋषियों का श्राप क्षय नहीं होता परन्तु मेरे पास जितना अधिकार है उस अधिकार के कारण मई तुम्हे आशीर्वाद देता हूँ की तुम पंद्रह दिन तक सुन्दर हो जाओगे यानि शुक्ल वर्ण के हो जाओगे स्वस्थ हो जाओगे और फिर पन्द्रह दिन तक तुम काले वर्ण के यानि रोगी हो जाओगे उसी का नाम कृष्ण पक्ष शुक्ल पक्ष पड़ा शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा की सुंदरता बढ़ जाती है और कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा की सुंदरता कम हो जाती है | भगवान् शिव ने उस रात को दो भागो को विभाजित कर दिया है और सोम मने चन्द्रमा होते है चन्द्रमा ने घोर तपस्या किया था और भगवान् शिव ने उसी प्रवास क्षेत्र में चन्द्रमा के रोगो को दूर किया था स्लिये चन्द्रमा ने उनसे यह आशीर्वाद माँगा हे प्रभु आप यहाँ स्वयंभू ज्योतिलिंग में प्रकट हो जाये और जो बी भक्त गण आपकर दर्शन करेंगे उनके सभी रोगो को आप नास करेंगे और उन्हें आरोग्यता प्रदान करेंगे ऐसा आशीर्वाद दीजिये भगवान् शिव संसार के कल्याण करने के लिए चन्द्रमा की बातो को सुन्न कर प्रसन्न हुए और वह स्वयंभू शिवलिंग के रूप में प्रकट हो गए इसलिए इसका नाम सोमनाथ ज्योतिलिंग पड़ा चन्द्रम ने उस मंदिर का निर्माण करवाया अतः श्रावण महीने के सोमवार के दिन या शुक्रवार के दिन या चतुर्दशी के दिन भगवान् शिव का दर्शन कर के उनका जला अभषेक करते है पूजन पाठ करते है प्रदोष काल में यानि शाम के समय भगवान् शिव जी का पूजन करते है तो उन्हें शारीरिक रोगो से मुक्ति मिलती है और उनको आरोग्यता प्राप्त होता है
बारह ज्योतिलिंगो का महत्व एवं स्थान
भारत देश में भगवान् शिव के बारह ज्योतिलिंग है | यह भारत जो है जंबु दीप में भरत नमक खंड को भारत माना गया है और शिव पुराण के अनुशार भगवान् शिव जो है बारह ज्योतिलिंगो के दुखो में स्व्यंभू अपने आप यहाँ पर प्रकट हुए है भक्तो की प्राथना सुन के शिव पुराण के अनुशार जो व्यक्ति इन् बारह ज्योतिलिंगो का दर्शन करता है या सुबह शाम इनका नाम लेता है भगवान् शिव की कृपा से सात जन्मो का किया हुआ पाप भी नष्ट हो जाता है | शास्त्र में कहा गया है की भगवान् शिव को बारह महीनो में सावन महीना अति प्रिय है और श्रावण मॉस में जो भक्त भगवान् शिव के बारह ज्योतिलिंगो का दर्शन करते है बहगवां शिव प्रसन्न हो कर के उनके सभी दुखो को दूर करते है | श्रवण मॉस में अधिक से अधिक मांत्रा में भक्त गण इन् बारह ज्योतिलिंग का दर्शन करने के लिए जाते है | बाबा वैद्यनाथ धाम जो है बिहर में वह पर लोग कावर लेकर के जल चढाने के लिए जाते है | दूर दुर्र से पैदल यात्रा करके भगवान् शिव का दर्शन का लाभ उठाते है | सावन महीना में कशी में विश्वनाथ जी का दर्शन करके जलाविषेक करते है ईसिस प्रकार अन्य ज्योतिलिंगो में भी भक्त गण गंगा आदि नदियों से जल लेकर के पैदल चल करके दूर दूर से यात्रा करके भगवान् शिव पर जल चढ़ाते है और उनका दर्शन करते है और इन् ज्योतिलिंगो का बहुत महत्व है| यह ज्योतिलिंग बारह स्थानों पर भारत में स्तिथ है – पहला गुजरात प्राचीन काल में उसका नाम कठियावाड़ा प्रदेश था गुजरात नामांक प्रभास क्षेत्र में भगवान् शिव सोमनाथ नामक ज्योतिलिंग विख्यात है वह पर उस मंदिर की स्थापना स्वयं चन्द्रमा ने करवाया था और भगवान् शिव जो चन्द्रमा पे प्रसन्न हो कर के स्वयं उस शिवलिंग में प्रकट हो करके सभी भक्तो को दर्शन देते है | दूसरा मालिकाअर्जुन नमक से यह ज्योतिलिंग जो है आंध्र प्रदेश में स्तिथ है | यहाँ पर भगवान् श्री मल्लिका अर्थात पार्वति और अर्जुन अर्थात भगवान शिव यहाँ पर पांडवो ने इना गौर तपस्या किया था स्वयं अर्जुन ने यहाँ पर तपस्या किया था भगवान् शिव प्रसन्न हो कर के अर्जुन को पारसोपार अस्त्र प्रदान किया था और साहित्य में , अर्जुन नियम में इसका वर्णन मिलता है ओह भगवान् शिव मल्लिका अर्जुन ज्योतिलिंग में विद्यावान है वह श्री सेंकी नाथ पर स्तिथ है | तीसरा मल्वा प्रदेश जिसको आज हम मध्य प्रदेश के नाम से जानते है भगवान् शिव जो वहा महाकाल के रूप में उज्जैन शहर में स्तिथ है वह पर भक्तो को दर्शन देते है और भक्त गण दर्शन कर के अपने आप को धन्य मानते है यह ज्योतिलिंग महाकालेश्वर के नाम से भी विख्यात है यहाँ पर छिप्रा नदी भी है उन्ही के तट पर महाकाल विराजते है वह भी स्वयंभू शिवलिंग है किसी ने भी स्थापना नहीं किया है | चौथा खंडवा जिला यानि मध्य प्रदेश में हे नर्मदा नदी के तट पर भगवान् शिव जो है ओमकालेश्वर ज्योतिलिंग के नाम से विख्यात है यह ओमकालेश्वर नामांक पर्वत पर स्तिथ है और वही पे कुछ दूरी पर नर्मदा नदी के किनारे दूसरे तट पर ममलेश्वर नाम से भी विख्यात है वह भक्त गण दर्शन प्राप्त करते है | पांचवा महाराष्ट्र के परली नमक गांव में भगवान वैद्यनाथ नाम से ज्योतिलिंग रूप में स्तिथ है और शिव पुराण में कहीं कहीं वर्णन आया है की और लिंग पुराण में बिहार में गृही जिले में स्तिथ इससे चिंता व् मुख कहा जाता है इस समय जो झारखण्ड में चले गये है वह पर भगवान् वैद्य नाम से भकतो को दर्शन देते है | छटा महाराष्ट्र में भीमाशंकर नमक ज्योतिलिंग नाम से भगवान् शंकर विराजमान है उन्ना जिले में वह डाटिली और शातिलयो का निवास स्थान है वह भीमा नदी भी है और भक्त बिमा नदी के तट पर भगवान् शिव भीमा शंकर ज्योतिलिंग नाम से विख्यात है और वह पर्वत का नाम सायाद्रिक पर्वत नाम है इस पर्वत पर भगवान् शिव भीमा शंकर ज्योतलिंग नाम से आज भी पूजे जाते है | सातवा तमिल नाडु में रामेश्वरम नाम से समुद्र तट पर भगवान् शिव स्तिथ है जहा स्वयं भगवान् ऍम चंद्र जी ने शिवलिंग की स्थपना की है और वह उनका पूजन किया था वह शिवलिंग रामेश्वरम नाम से विख्यात है | अथवा नागेश्वर ज्योतिलिंग यह जो है द्वारिका वन में स्तिथ है गुजरात के जाम नगर से कुछ दूरी पर द्वारिका नाम वन में शिव द्वारिका में नागेश्वर ज्योतोलिंग के रूप में विख्यात है | नौवा वाराणसी यानि काशी में विश्वनाथ नाम से विखैत है जिसको आत्मा विशेषवत कहा जाता है यहाँ पर भगवान् शिव स्वयं भक्तो को दर्शन देते है यह भी स्वयंभू शिवलिंग है | दसवा उन्ना जिले से कुछ दूरी पर गोदावरी नदी के तट पर नासिक के जंगलो में भगवान् शिव त्रम्भकेश्वर नाम से स्तिथ है गौतम ऋषि के आराधना करने पर भगवान् शिव ,ब्रह्मा , विष्णु यहह तीनो एक साथ प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिए थे इसलिए वहा पर तीनो के दर्शनक साथ किये जाते है वहा तीन छोटे छोटे शिवलिंग है इससे triyamkar त्रम्भकेश्वर गौतमी भी कहा जाता है वहा गोदावरी नाड पर त्रम्भकेश्वर ज्योतिलिंग है वहा पर सुपनखा का नाक भी काटा गया था | गयारहवा हिमालय पर्वत पर केदारनाथ नाम से विख्यात है | बाहरवा घृष्णेश्वर ज्योतिलिंग जो की वेरुल नमक गांव में स्तिथ है यह औरंगाबाद के पास महाराष्ट्र में है | यह बारह ज्योतिलिंग भारत वर्ष में स्तिथ है जहा स्वयं भगवान् शिव सयम्भू शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए है यहाँ भक्त गण दर्शन कर के पूजा कर के भगवान् शिव के कृपा से इस पृथ्वी के सभी सुखो का भोग कर के नट में मोक्ष को प्राप्त करते है आठ श्रावण मॉस में जो भक्त गण जो भगवान् शिव का जला अभिसेक , दुग्धाभिषेक , गन्ने के रस से , ऋतुओ के फल से अभिषेक करते है दर्शन करते है हगवां शिव उनपे हमेशा अच्छी कृपा बनाये रहते है |
लग्न कुंडली में शुक्र का प्रभाव
जन्म कुंडली में शुक्र गृह का विचार इसलिए किया जाता है क्योंकि शुक्र ग्रह के द्वारा सुख शांति भूमि भवन वाहन आदि के बारे में विचार किया जाता है यदि जन्म कुंडली में शुक्र ग्रह छटे स्थान में बैठा हो तो निष्फल हो जाता है | अर्थात कोई शुभ अशुभ फल नहीं देता है परन्तु यही शुक्र ग्रह यदि सप्तम स्थान में अकेले बैठा हो तो वह अशुभ फल देता है चुकी जन्म कुंडली में सातवे स्थान का विचार पति पत्नी के संबंधन के बारे में किया जाता है तो शुक्र ग्रह यदि अकेला बैठा हो तो पति पत्नी में सम्बन्ध अच्छा नहीं होने देता यानि बिगाड़ देता है यह एक दूसरे के ऊपर आरोप और प्रत्यारोप भी लगाते है | जीवन में शुक्र ग्रह का प्रभाव बहुत महत्वपूर्ण है यह ग्रह पूर्व और दक्षिण दिशा का स्वामी है तथा गौर और श्याम वर्ण का है साथ में यह जल तत्व ग्रह है इससे कुघ , विया आदि के बारे में विचार किया जाता है तथा जल सम्बंदित ग्रह होने के चलते हमारे शरीर में जो जल तत्व है उसके बारे में विचार किया जाता है साथ में यह स्त्री जाती का ग्रह है | इस ग्रह के प्रभाव से जातक का रंग गेहूवा रंग का होता है | यदि जन्म कुंडली के लग्न स्थान में जन्म लेते समय शुक्र बैठा हो ततो समझ जाइये की वह लड़का गेहूवा रंग का होता है साथ में इससे काम , सुख आदि के बारे में विचार किया जाता है | संगीत के बारे में भी इस ग्रह के माध्यम से होता है यदि कोई सुन्दर काव्य गाने वाला होता है या चित्रकार होता है तो उसका नाम देश विदेश में भी होता है शुक्र ग्रह यदि शुभ ग्रहो के साथ बैठा हो तो या अपने उच्च राशि यानि मीन राशि में बैठा हो चुकी मीन राशि में शुक्र उच्च का हो जाता है तो अच्छा फल देता है | जन्म कुंडली के पांचवे स्थान में यदि शुक्र बैठा हो तो जातक सभी शास्त्रों को जानने वाला होता है यानि विद्यावान होता है | यदि गायरवे घर में बैठा हो तो शुक्र अपने मित्र ग्रह के साथ बैठा हो तो यह भूमि, वाहन , वहां का लाभ करता है | चतुर्थ स्थान में यदि शुक्र बैठा हो तो इससे माता का विचार किया जाता है यदि जिस जातक का जन्म दिन में हुआ है वह शुक्र ग्रह के द्वारा उसके माता के बारे में विचार किया जाता है साथ में शारीरिक सुखो के बारे में विचार किया जाता है इसलिए शुक्र ग्रह आपके जन्म कुंडली में अशुभ अवस्था में हो कोई शुभ फल नहीं दे रहा हो आपके घर में कलह हो या व्यापार में हानि हो तथा शारीरिक को कोई कमजोरी हो या कफ की अधिकता हो तो समझ जाये आपकी कुंडली में शुक्र ग्रह ख़राब है या भूमि वाहन नहीं हो तो भी वह शुक्र ग्रह के कारण हे होता है इसलिए उस व्यक्ति को कोई सनसारिक लाभ प्राप्त नहीं होता है इसका निवारण है ॐ शुक शुक्राये नमः इस मंत्र का प्रति दिन जप करना चाहिए साथ में चावल लेकर गाये को खिलाना चाहिए जिसकी कुंडली में शुक्र ग्रह ख़राब हो तो उससे हाथ में चावल लेकर अपना नाम गोत्र लेकर यख कहना चाहिए मई शुक्र ग्रह निवारण के लिए मैं गाये को चावल खिलने जा रहा हूँ या जा रही हूँ उसके पश्चात घर में यदि पूजा पाठ करते हो तो पूर्व दिशा के तरफ मुख कर के भगवान् सूर्य को जल देने के बाद शुक्र ग्रह के बीज मंत्र का १०८ बार जप करना चाहिए इस मंत्र को शुक्रवार के दिन से आरम्भ करना चाहिये साथ में सफेद कपडे में चावल बाँध कर चीनी बाँध कर शुक्रवार के दिन दान करना चाहिए इससे शुक्र ग्रह अनुकूल हो जाता है हुए अशुभ फल नष्ट हो जाते है और वह शुभ फल प्रदान करने लगते है |
लग्न कुंडली में बृहस्पति ग्रह
जन्म कुंडली में बृहस्पति ग्रह का बहुत प्रभाव माना जाता है | यदि जन्म कुंडली में दुईतृया पंचम सप्तम स्थान में अकेला बृहस्पति ग्रह बैठा हो तो धन पुत्र स्त्री के लिए सर्वदा अनिष्ट कारक होता है | यदि उसके साथ किसी पाप ग्रह का योग हो या किसी पाप ग्रह का दृष्टि पड़ता हो तो बृहस्पति शुभ फल देते है | और यदि कुंडली में स्वतंत्र रूप से बैठे है किसी ग्रह का कोई दृष्टि नहीं है न किसी का योग है वह जो है अकेले तृत्य पंचम सप्तम भाव में धन , पुत्र स्त्री के लिए अनिष्टकारक हो जाते है और बृहस्पति का दूसरा प्रभाव यह है की जन्म कुंडली के छटे स्थान में अकेला बृहस्पति बैठा हो तो शत्रु हन्ता योग बनता है अर्थात सर्वदा उसके शत्रुओ का नास करता रहता है बृहस्पति ग्रह जो है उत्तर और पूर्व दिशा के स्वामी है यह पीले रंग के ग्रह है तथा आकाश तत्व है यह पुरुष वर्ण के है इसलिए इनके जप तप व्रत में पीला रंग का उपयोग किया जाता है साथ में लग्न में बलि होते है चन्द्रमा के साथ बैठने से चैसठा बलि हो जाते है जन्म कुंडली में बृहस्पति वात रोग पीत रोग के कारक ग्रह है इसलिए बृहस्पति ग्रह का जन्म कुंडली में विशेष प्रभाव पड़ता है क्योंकि बृहस्पति सप्तम में बैठे हो तो जातक की स्त्री बहुत आलसी होती है साथ में उसको सिर सम्बंदित पीड़ा होता है यदि लग्न में बृहस्पति बैठा हो तो जातक और जातक की पत्नी दोनों के लिए आलस के कारक ग्रह हो जाते है यदि उसके साथ में पाप ग्रह बैठा हो तो बृहस्पति शुभ फल देने लगते है और अकेले बैठे हो तो अशुभ फल देते है उस स्तिथि में बृहस्पति ग्रह का पूजा पाठ जप तप व्रत करना चाहिए यदि बृहस्पति जन्म कुंडली में ख़राब हो अनिष्ट फल दे रहे हो उनके शांति के लिए उनके दुस प्रभाव को रोकने के लिए उनका बीज मंत्र का जप करना चाहिए ॐ ब्रिहं बृहस्पाताए नमः का जप करना चाहिए सर्व प्रथम प्रातः स्नान आदि कर के एक पीले आसन पर बैठना चाहिए तथा देसी घी का दिया जाला कर के उनके बीज मंत्र का १०८ बार मंत्र का जप करना चाहिए इस जप के प्रभाव से बृहस्पति ग्रह प्रसन्न होते है और शुभ फल प्रदान करते है साथ में यदि किसी का बृहस्पति ग्रह ख़राब हो उन्हें गुरूवार के दिन केला और चने का दाल नहीं खाना चाहिए तथा केला और चने के दाल का दान करना चाहिए दान करने से बृहस्पति के दुस प्रभाव समाप्त हो जाते है साथ में बृहस्पति ग्रह से पुत्र पौत्र और विद्या का भी विचार किया जाता है | सरीर में सूजन रोग उदर कष्ट भी बृहस्पति के कारण होता है इसलिए आरोग्यता धन धान की प्राप्ति के लिए आदि बृहस्पति का जप व् अनुष्ठान करवाना चाहिए घर में विधि पूर्वक बृहस्पति का मंत्र का जप कर के पूजन कराना चाहिए साथ में पीपल के लकड़ी से हवन करना चाहिए इससे बृहस्पति अनुकूल हो जाते है और शुभ फल प्रदान करते है |
बुध ग्रह का लग्न कुंडली में महत्व
जन्म कुंडली में बुध ग्रह का बहुत बड़ा महत्व होता है | बुध ग्रह जो है उत्तर दिशा का स्वामी होता है तह पुरुष जाती का ग्रह है परन्तु साथ में इससे नफूंसक ग्रह भी कहते है इसमें तीन प्रकार का दोष होता है इसकी प्रकृति तीन दोषोवाली होती है साथ में यह श्याम वर्ण का होता है पृथ्वी तत्व ग्रह है यह पाप ग्रहो में सूर्य मंगल राहु केतु तथा शनि के साथ रहने से अशुभ फल देता है शुभ ग्रहो में च्नद्र, शुक्र, बृहस्पति के साथ रहने से शुभ प्रदान करता है इसलिए इससे नफूंसक ग्रह कहा जाता है जिस ग्रह की दसा यानि महादशा में या अंतर दशा में बुध की दसाए चलती है उस ग्रह के अनुसार बुध ग्रह फल प्रदान करता है साथ में यह ग्रह का ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बुद्धि और चिकित्सा व्यापार शास्त्र विद्या शिल्प विद्या कानू और वाडीज्य में की पढाई के बारे में विचार किया जाता है साथ यह चतुर्थ स्थान में रहने से तथा दसम स्थान के रहने से यह शुभ फल देता है भूमि , वहां, वाहन का सुख दिलवाता है | परन्तु बुध ग्रह चतुर्थ स्थान में निष्फल प्रदान करता है | अर्थात न कोई शुभ फल देता है और न हे कोई अशुभ फल देता है इसके द्वारा जीभा के बारे में भी विचार रोग किया जाता है तारु के बारे में भी विचार किया जाता है साथ में उपचारां सम्बंदित और हाडियो के बारे में भी विचार किया जाता है इसके द्वारा वाणी रोग गुहिय रोग बुद्धि भर्म गूंगा के बारे में भी विचार किया जाता है यदि कोई बोल नहीं पाता तो उसके कुंडली में बुध ग्रह ख़राब है और आलास का कारक ग्रह भी बुध है तथा वाक् रोग तथा कुष्ट रोग का भी कारक बुध ग्रह है इसलिए बुध ग्रह का विचार विशेष रूप से किया जाता है | जन्म कुंडली के चतुर्थ स्थान में यह निष्फल देता है परन्तु चतुर्थ और दसम स्थान का कारक ग्रह बुध है | बुध यदि पंचम घर लगन स्थान में बैठा हो चतुर्थ घर सप्तम तथा दसम घरो में शुभ ग्रहो के साथ बैठा हो शुभ ग्रहो की राशि पे बैठा हो और शुभ ग्रहो की उसपर दृष्टि हो तो व्यक्ति को मान समान प्रतिष्ठा तथा विद्या में भी व्यापार सम्बंधित सफलता प्राप्त होती है | विद्या में व्यक्ति वकील होगा चिकत्सक और ज्योतिष का भी विचार किया जाता है क्योंकि बुध वाणी कारक ग्रह है इसलिए इस ग्रह का सम्बन्ध जिस व्यक्ति से होता है वह बहुत अधिक बोलने वाला होता है बुध ग्रह का यह एक प्रभाव है अगर बुध ग्रह पाप ग्रहो की दसा में हो या पाप ग्रहो के साथ बैठा हो तो तो उल्टा फल देने लगता है जिससे व्यक्ति के गले में दर्द , बलगम इत्यादि रोग हो जाते है खासी भी होती है साथ में गुप्त रोग भी होता है और पुष्ट रोग भी होता है हड्डी और जोड़ो में भी पीड़ा भी बुध ग्रह के प्रभाव से होता है यदि बुध ग्रह ख़राब हो तो बुद्धि भरबस्ट हो जाती है व्यक्ति का मति ख़राब हो जाता है वह यह नहीं सोच पाता है की मई क्या करू या क्या न करू इनसब बातो के निवारण हेतु बुध ग्रह का जप और अनुष्ठान करना चाहिए ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है की बुध ग्रह का शांति किस प्रकार होगा ॐ बुं बुध्याये नमः इस मंत्र का १०८ बार जप जप करना चाहिए | जप करने के बाद बुधवार के दिन हरे कपडे में हरा उरद और गुड़ बाँध कर के अपने ऊपर से साथ बार उतार कार के किसी गणेश जी के मंदिर में दान कर देना चाहिए | दूसरा उपाए यह है की हाथ में जल लेके पहले किसी गणेश मंदिर में जा के १०८ दुरुबा ले लीजिये दुरुबा को किसी पात्र में रख कर गणेश जी को केसर का तिलक लगाए और एक ध्रुबा का माला पहनना चाहिए | उसके बाद वहा बैठ कर के हाथ में जल ले करके कहिये मई बुध पीड़ा निवारण के लिए या बुध ग्रह की शांति के लिए तथा शुभ फल प्राप्ति के लिए मई भगवान् श्री गणेश को ध्रुवा चढ़ाने जा रहा हूँ या चढ़ाने जा रही हूँ | और ॐ गं गढ़पति नमः कह कर के एक एक dhruba चढ़ाना चाहिए इस प्रकार १०८ ध्रुबा चढ़ाने के बाद श्री गणेश भगवान् से क्षमा माँगा चाहिए फिर उसके बाद जल को पृथ्वी पर गिराने के बाद तीन बार उससे अपने माथे पर इसपर्श कर लेना चाहिए इस प्रकार करने से बुध ग्रह अनुकूल हो जाता है और व्यक्ति को शुभ फल प्रदान करता है | बुध ग्रह ख़राब होने से वाणी तो ख़राब होती हे है साथ में व्यक्ति का पुण्य क्षय होने लगता है जिससे व्यक्ति का कोई भी मनोकामना पुण्य नहीं होता है इस अवस्था में शुभ बोलना चाहिए जो व्यक्ति अच्छा बोलते है आप के द्वारा किसी का कल्याण हो किसी का भला हो तो भी बुध ग्रह अनुकूल हो जाते है और शुभ फल प्रदान करते है इसलिए बुध फल का विशेह प्रकार से पूजन पाठ कर के शांति करवाना चाहिए जिससे घर में कलेश न हो शारीरिक रोग न हो साथ में व्यक्ति का कल्याण हो |









